Real fact, real picture --
इंदिरा की भूल से ही खिला देश में कमल का फूल --
भाइयों और बहनों,
भले यह बात आपको बुरी या भली लगे, लेकिन यह बात सच है कि इंदिरा गांधी ने जिस दिन देशभर के सभी राजे राजवाड़ा की सरकारी शाही रैली यानि प्रीवी पर्स को बंद किया ,
उसी दिन से सारे रजवाड़े, धन्ना सेठ ,बड़े मारवाड़ी याने बनिया वर्ग पुरी तरह इंदिरा गांधी और कांग्रेस के खिलाफ हो गए।
वे सारे पूरी तरह एकजुट होकर तन मन धन से कांग्रेस को बदनाम करा लगे और उसकी सरकार को गिराने में लग गए।
जिन शासकों और रजवाड़ों की शाही थैली , उस सस्ती के दौर में सालाना मिलने वाले लाखों रुपए कांग्रेस सरकार ने वर्ष 1971 में बंद किया उसमें सबसे ज्यादा गुजरात के ही थे ।
अंग्रेजों ने जब भारत छोड़ा तभी राजे रजवाड़ों ने इसका विरोध किया और अपने जीवन निर्वाह शासन के लिए पेंशन की मांग की । अंग्रेजों के हस्तक्षेप के कारण तत्कालीन भारत सरकार ने उनको पेंशन में याने थैली , प्रीवी पर्स देना मंजूर किया।
इंदिरा गांधी ने जब उनको थैली बंद की, तब उस समय बड़ौदा के पूर्व राजा फतेह सिंह गायकवाड के नेतृत्व में राजाओं का एक बड़ा संगठन बना। जो सीधे कांग्रेस और इंदिरा गांधी के विरोध में उतर आया । चूंकि इन निठल्ले, निष्क्रिय राजाओं को बैठे-बिठाए हर साल ₹10 लाग से अधिक की धनराशि, उस सस्ती के दौर में मिल जाती थी।
इसलिए इन लोगों ने कांग्रेस को उखाड़ने के संकल्प के साथ काम करना शुरू कर दिया । कांग्रेस के खिलाफ दुष्प्रचार शुरू कर दिया और इसके लिए उन्होंने आम जनता के बीच भी पैसे बांट कर अपने एजेंट बनाए।
सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक उस समय सिर्फ गुजरात के ही 83 शासकों को शाही थैली मिल रही थी।
यह थैली बंद होने से उनको 81 लाख रूपए की आमदनी से हाथ धोना पड़ा। मध्य प्रदेश के 59 पूर्व राजाओं को भी यही थैली मिलती थी। भोपाल के राजमहल में इस सरकारी पैसे से 30 फोन कनेक्शन लगाए हुए गए थे ।
जयपुर ,ग्वालियर ,जोधपुर उदयपुर के राजघरानों को 10, 10 लाख रुपए मिलते थे। जबकि मैसूर के राजा को 26 लाख, त्रावणकोर के राजा को 18 लाख, पटियाला के राजा को 17 लाख और हैदराबाद के निजाम को 20 लाख रुपए की थैली, उस दौर में मिलती थी।
बावजूद उसके इन लोगों ने ध्रांगधरा के पूर्व राजा मयूर सिंह तृतीय के नेतृत्व में अपनी रियाया को भड़का कर विद्रोह किया ।
इसके कारण तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरी को सभी राजाओं, महाराजाओं की मान्यता रद्द करनी पड़ी और इंदिरा गांधी को शाही थैली बंद करना पड़ा।
इसके बाद सभी राजा महाराजा ने देश विरोधी ताकतों के साथ मिलकर भारत में आंतरिक उथल-पुथल विद्रोह, बगावत करवाना शुरू कर दिया।
विपक्षी दलों , विरोधी संगठनों को पैसे देकर उनकी फंडिंग करके आंदोलन करवाए। लाचार होकर इंदिरा गांधी को इमरजेंसी लगानी पड़ी। उस इमरजेंसी को भी इन रजवाड़ों ने काफी बदनाम करवाया।
इमरजेंसी के बाद समाजवादी दलों की पूंछ पकड़कर इन राजे राजवाड़े ने दक्षिणपंथी संगठनों का साथ लेकर कांग्रेस विरोधी मुहिम शुरू कर दी और सत्ता तक पहुंच गए।
जनता में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाई। बाद में जयप्रकाश नारायण ने भी यह भूल स्वीकार की कि उनको संपूर्ण क्रांति के आंदोलन में इन दक्षिणपंथी लोगों , अंग्रेजों के दलालों को शामिल नहीं करना चाहिए था । लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
वर्ष 1980 में इंदिरा गांधी के दोबारा सत्ता में आने के बाद से बौखलाए लूटेरा बनिया वर्ग, राजा राज वाड़ो ने मिलकर भाजपा की स्थापना की, क्योंकि पुराना संगठन जनसंघ बिल्कुल बेकार हो गया था । जनता में उसकी कोई स्वीकार्यता नहीं थी।
इसलिए पुराने जनसंघ को नए ढंग से रीलॉन्च करके उसे भाजपा का रूप दिया गया। तब से निरंतर उसको फंडिंग करके यह राजे रजवाड़े, कारपोरेट घराने मजबूत करते रहे हैं।
इंदिरा गांधी से यही गलती हुई थी कि उन्होंने इन माफिया तत्वों, राजा रजवाड़ों पर पूरा नकेल नहीं कसी। लोकतंत्र के नाम पर इनको बोलने, घूमने, संगठन बनाने, सभा सोसाइटी करने की पूरी आजादी दे दी।
अगर इंदिरा जी उन पर पूरा अंकुश लगाए रखती तो उनका सिंडिकेट नहीं बनता और वह सारे कारोबारी मिलकर देश विरोधी तत्वों से सांठगांठ करके उनकी हत्या नहीं करवा देते ।
हत्या के बाद दुर्भाग्य से कांग्रेस का नेतृत्व कमजोर अनुभवहीन हाथों में चला गया। इससे सभी राजे रजवाड़े पुनः गोलबंद होकर सक्रिय हो उठे। दक्षिणपंथी विचारधारा को मजबूत करने लगे । राष्ट्रवाद के नाम पर बनियावाद को मजबूत किया और आतंकवाद, हिंदुत्व आदि के नाम पर लोगों को धोखा देते हुए अपनी सरकार भी बना ली।
वास्तव में यह तमाम धन्ना सेठ, राजे रजवाड़े अपनी थैली को बंद करने के अलावा बैंकों के राष्ट्रीयकरण से भी नाराज थे। क्योंकि इन दोनों कदम से उनका पूरा पावर चला गया था। इसलिए उन्होंने कांग्रेस को उखाड़ने के लिए अपनी पूरी पूंजी लगा दी । पूरी शक्ति लगा दी। सभी विपक्षियों की वह फंडिंग करते रहे।
जॉर्ज फर्नांडिस के रेल आंदोलन से लेकर हर बड़े आंदोलन के पीछे इन्हीं रजवाड़ों की पैसे की ताकत होती थी। दरअसल, अपनी हुकूमत पाने के लिए, अपनी ताकत पाने के लिए इन बनियों , राजे रजवाड़ों ने कांग्रेस को जमकर बदनाम किया। आज तक हुए कर रहे हैं । राहुल गांधी को पप्पू कह रहे हैं । इसलिए इन लोगों ने मिलकर आज भी दिल्ली में पुनः अपनी कठपुतली सरकार बिठा ली है और बारी बारी से सार्वजनिक संपत्तियों को खरीदने जा रहे हैं। लोकतंत्र को खत्म कर, वापस राजतंत्र लाते जा रहे हैं।
50 के दशक से ही ग्वालियर का राजघराना, सिंधिया परिवार, विजय राजे सिंधिया शुरू से ही दक्षिणपंथी विचारधारा यानी भाजपा की फंडिंग करती रही।
अहमदुल्लाह सइदी आरफी

کوئی تبصرے نہیں:
ایک تبصرہ شائع کریں